
दोहरीघाट से दिल्ली: संस्कारों की विरासत
जीवन की यात्रा में कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं जो समय के साथ स्मृति बन जाती हैं, और कुछ स्मृतियाँ ऐसी होती हैं जो धीरे-धीरे जीवन की कथा का रूप ले लेती हैं। यह पुस्तक उन्हीं स्मृतियों की एक विनम्र प्रस्तुति है। यह किसी इतिहासकार की दृष्टि से लिखी गई औपचारिक कथा नहीं है, बल्कि उन अनुभवों का संकलन है जिन्हें लेखक ने अपने परिवार में जिया, महसूस किया और समझा। इसमें उनके माता-पिता, परिवार के अन्य सदस्यों और जीवन के अनेक प्रसंगों की झलक है, जिन्होंने जीवन के मूल्य, संबंधों का महत्व और संस्कारों की शक्ति सिखाई। दोहरीघाट की मिट्टी में पले-बढ़े परिवार की यात्रा जब दिल्ली जैसे महानगर तक पहुँची, तब यह केवल भौगोलिक परिवर्तन नहीं था, बल्कि नए संघर्षों, नई चुनौतियों और नए अवसरों की यात्रा भी थी। पाठकों को इन प्रसंगों में अपने ही परिवार और जीवन की झलक दिखाई देगी।
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